Explainer: बांग्लादेश में बृहस्पतिवार यानी 12 फरवरी को 13वां आम चुनाव होने जा रहा है। इस चुनाव के साथ एक ऐतिहासिक रेफरेंडम (जनमत संग्रह) भी हो रहा है। यह 1991 के बाद होने वाला बांग्लादेश का पहला रेफरेंडम है, जो जुलाई नेशनल चार्टर पर आधारित है। बता दें कि जुलाई-अगस्त 2024 के दौरान छात्रों के नेतृत्व में शेख हसीना के खिलाफ हुए विद्रोह में उनकी 15 साल पुरानी सरकार गिर गई थी। इसके बाद हसीना को देश छोड़कर भारत भागना पड़ा। इसके बाद अंतरिम सरकार के मुखिया बने मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश में नये सुधारों के नाम पर यह चार्टर तैयार किया गया, जो अगर पास होता है तो भारत के लिए भी चिंता का विषय है।
यूनुस सरकार की ओर से तैयार इस नेशनल रेफरेंडम में 80 से ज्यादा प्रस्ताव हैं, जिनमें 47-48 संवैधानिक संशोधन शामिल हैं। रेफरेंडम के माध्यम से देश के मतदाता सुधारों पर अपने वोट के जरिये मुहर लगाएंगे। इसमें वह प्रधानमंत्री के कार्यकाल को सीमित करने, संसद को द्विसदनीय करने जैसी अहम बातें हैं। इसके तहत 100 सदस्यों वाला ऊपरी सदन (upper house) पार्टियों के वोट अनुपात में बनेगा। देश में संविधान संशोधन के लिए इसकी मंजूरी जरूरी होगी। वहीं इस चार्टर के अनुसार
चुनाव आयोग, देखभाल सरकार, न्यायपालिका स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों का विस्तार, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना आदि सुधार बाध्यकारी होंगे। नए संसद को 180 दिनों में संवैधानिक सुधार परिषद बनाकर बदलाव लागू करने होंगे।
भारत के लिए यह रेफरेंडम और चुनाव महत्वपूर्ण हैं क्योंकि 2024 विद्रोह के बाद बांग्लादेश में एंटी-इंडिया सेंटिमेंट (विरोधी भावना) तेज हुई है। शेख हसीना भारत की करीबी राजनेता थीं, जिनको निर्वासित कर दिया गया। इस चुनाव में उनकी पार्टी अवामी लीग को बाहर कर दिया गया है। मुख्य प्रतिस्पर्धी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी गठबंधन हैं, जहां जमात-ए-इस्लामी (इस्लामिस्ट) का उदय भारत के लिए चिंता का विषय है। यह अल्पसंख्यकों (हिंदू), सीमा सुरक्षा, पानी बंटवारे, और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर डाल सकता है। भारत में बीजेपी पश्चिम बंगाल और असम चुनावों के संदर्भ में इसे "घुसपैठ" और "डेमोग्राफिक थ्रेट" से जोड़कर देखती है। यूनुस सरकार के तहत सुधारों से भारत-विरोधी ताकतें मजबूत हो सकती हैं, जिससे द्विपक्षीय संबंध प्रभावित होंगे।
इस प्रस्ताव में बांग्लादेश में द्विसदनीय संसद और ऊपरी सदन का गठन करने की बात है। ऐसा होने पर इसके ऊपरी सदन में प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन से छोटी/इस्लामिस्ट पार्टियां (जैसे जमात-ए-इस्लामी) मजबूत हो सकती हैं, जो भारत विरोधी हैं। संविधान संशोधन में उनकी मंजूरी जरूरी होने से भारत-विरोधी नीतियां (जैसे सीमा सुरक्षा, पानी बंटवारा, व्यापार) के पास होने का खतरा रहेगा। इसके अलावा प्रस्ताव में देश की पहचान में बदलाव करना भी शामिल है। इसमें संविधान के अनुच्छेद 6(2) से "बंगाली" शब्द हटाकर "बांग्लादेशी" करना और सभी मातृभाषाओं को मान्यता देना है। यह प्रस्ताव इस्लामिक/राष्ट्रीयतावादी ताकतों को मजबूत कर सकता है, जो अल्पसंख्यक (हिंदू) सुरक्षा पर असर डाल सकता है।
यह भी भारत के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि अगर बीएनपी-जमात गठबंधन सत्ता में आता है, तो भारत-विरोधी एजेंडा (जैसे 1971 युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल, हसीना के समर्थकों का दमन) तेज हो सकता है। प्रस्ताव पास होने और बीएनपी (फ्रंटरनर) और जमात-ए-इस्लामी की सरकार बनने पर भारत के साथ संबंध खराब हो सकते हैं। इससे एंटी-इंडिया सेंटिमेंट बढ़ सकता है, सीमा पर तनाव, हिंदू अल्पसंख्यक सुरक्षा, तिस्ता पानी विवाद आदि प्रभावित होंगे। इससे पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच संबंध अधिक मजबूत हो सकते हैं। जबकि भारत पूर्व पीएम शेख हसीना की आवामी लीग पार्टी को समर्थन देता था, जो अब चुनाव से बाहर कर दी गई है।
बांग्लादेश के लीड अखबार डेली स्टार के अनुसार आगामी जनमत संग्रह अनोखा है, क्योंकि मतदाता इस प्रक्रिया में अंतिम पड़ाव नहीं होंगे। यदि जनमत संग्रह सफल होता है-यानी “हाँ” का वोट बहुमत में आता है तो यह आगे के कई कदमों की प्रक्रिया शुरू कर देगा। सामान्यतः जनमत संग्रह किसी प्रक्रिया के अंत में आता है, जब मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा और बहस हो चुकी होती है और संसद में सुपरमेजॉरिटी मिल चुकी होती है। उस समय संप्रभु नागरिकों का अंतिम निर्णय होता प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करना होत है, लेकिन इस जनमत संग्रह में ऐसा नहीं है।
मतदाताओं से पूछा जाएगा कि क्या वे जुलाई चार्टर के कार्यान्वयन आदेश और 47 संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता वाली प्रस्तावों के सारांश को मंजूरी देते हैं। कार्यान्वयन आदेश में कई कदमों का उल्लेख है, जैसे जनमत संग्रह का विस्तृत आदेश जारी करना, संवैधानिक सुधार परिषद का गठन (जो वास्तव में पूरे संसद का दूसरा रूप होगी), उसकी समयसीमा, विघटन, ऊपरी सदन (अपर हाउस) का गठन आदि। जनमत संग्रह का अध्यादेश पहले ही जारी हो चुका है, जो चुनाव आयोग को मतदान कराने का कानूनी ढांचा देता है-क्योंकि मौजूदा संविधान में जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है। इस आदेश के तहत संवैधानिक सुधार परिषद जुलाई चार्टर की सिफारिशों को पूरे परिषद के साधारण बहुमत (300 सदस्यों में 151 वोट) से पास कर सकती है, जो वास्तव में संविधान में संशोधन होगा।
प्रस्ताव के अनुसार परिषद को सभी सुधार पूरा करने के लिए 180 कार्य दिवसों की समयसीमा दी गई है, लेकिन कोई आकस्मिक व्यवस्था नहीं है कि यदि समयसीमा पूरी नहीं हुई या सभी मुद्दों पर फैसला नहीं हुआ तो क्या होगा, इसका कोई प्रावधान नहीं है। परिषद के विघटन के बाद उसके निर्णय संविधान में शामिल हो जाएंगे और गजट में प्रकाशित होंगे। अंतिम संविधान की भाषा क्या होगी, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता, और “हाँ” वोट देने वाले मतदाताओं का उस पर कोई नियंत्रण नहीं रहेगा। दूसरी ओर, “नहीं” का वोट सुधार प्रक्रिया पर पूरी तरह रोक लगा देगा, जिसे अंतरिम सरकार का मुख्य जनादेश कहा गया है। बैलेट पेपर पर कुछ प्रस्तावों का संक्षिप्त उल्लेख है और उन्हें तयशुदा माना गया है। सरकार का अभियान खुलकर “हाँ” के पक्ष में है-दावा करता है कि “हाँ” जीत से फासीवाद का अंत होगा और सुधार चाहने वालों को “हाँ” वोट देना चाहिए।
डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक हाँ या नहीं कहना मतदाताओं के लिए मुश्किल है, क्योंकि इतने सारे मुद्दे एक साथ बंडल किए गए हैं। बैलेट के पहले पैराग्राफ में लिखा है: “चुनाव-समय की देखभाल सरकार, चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाएं करेंगी, जो जुलाई चार्टर में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार गठित होंगी। दूसरा पैराग्राफ: “अगला संसद द्विसदनीय होगा। राष्ट्रीय संसदीय चुनाव में पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में 100 सदस्यों का ऊपरी सदन गठित होगा। संविधान संशोधन के लिए ऊपरी सदन के बहुमत की मंजूरी जरूरी होगी। ये पैराग्राफ अलग-अलग और विविध मुद्दों को संबोधित करते हैं-कुछ को व्यापक समर्थन मिल सकता है, कुछ को नहीं। कुछ प्रस्तावों पर मजबूत भावनाएं हैं, तो कुछ पर नहीं। फिर भी बैलेट में इन मतभेदों को व्यक्त करने का कोई तरीका नहीं है। इस प्रकार जनमत संग्रह नागरिकों को समझौते के लिए मजबूर करता है या तो वे कई प्रस्तावों को अनिच्छा से स्वीकार करें जिनका वे विरोध करते हैं, या पूरे पैकेज को अस्वीकार कर दें भले ही कुछ प्रस्ताव स्वीकार्य हों। लेकिन इस गणतंत्र की भावना, खासकर जुलाई विद्रोह के बाद की आकांक्षा, बहुमत के शासन के बजाय अल्पसंख्यकों को समायोजित करने की रही होगी।
बांग्लादेश में अब तक तीन जनमत संग्रह हो चुके हैं, जो राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में हुए। अब 12 फरवरी को चौथा रेफरेंडम होने जा रहा है। इसे कई मामलों में विवादित भी माना जा रहा है। क्योंकि इसमें जुलाई-अगस्त 2024 आंदोलन के दौरान सत्ता में रही शेख हसीना समेत उनकी पार्टी के नेताओं और अधिकारियों को आंदोलन के दमन की कोशिश में मौत की सजा दिए जाने का प्रावधान करने की बात कही गई है।
30 मई 1977 में हुआ, जिसमें मुख्य रूप से यह सवाल पूछा गया- क्या आप राष्ट्रपति मेजर जनरल जियाउर रहमान और उनकी नीतियों पर विश्वास करते हैं? इसमें 3,83,63,858 मतदाताओं ने वोट दिया। मतदान का प्रतिशत 88.05% रहा। रेफरेंडम के पक्ष में 98.88% फीसद और विपक्ष में 1.12% वोट पड़े।
बांग्लादेश का दूसरा जनमत संग्रह 21 मार्च 1985 में हुआ। इसमें सवाल पूछा गया- क्या आप राष्ट्रपति लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मुहम्मद एरशाद की नीतियों और कार्यक्रमों पर विश्वास करते हैं और निलंबित संविधान के अनुसार चुनाव तक उनके राष्ट्रपति पद पर बने रहने का समर्थन करते हैं? इसमें 4,79,10,964 मतदाताओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान 72.44% फीसद मतदान हुआ। 94.11% फीसद लोगों ने हां और 5.50% फीसद लोगों ने खिलाफ में वोट किया।
तीसरा रेफरेंडम 15 सितंबर 1991 में हुआ। इस दौरान मतदाताओं से सवाल पूछा गया -क्या बांग्लादेश गणप्रजातंत्र के संविधान (बारहवां संशोधन) विधेयक, 1991 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलनी चाहिए?...इस प्रस्ताव पर 6,22,04,118 मतदाताओं ने वोट किया। मतदान 35.19% रहा। हाँ में 84.38% और नहीं में 15.64% वोटरों ने मत दिया।
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